परमेश्वर के बिना दिन अवर्णनीय रूप से कष्टदायक हैं
जब लोग नहीं जानते कि
भाग्य क्या है
यहां परमेश्वर की संप्रभुता
को नहीं समझते
तो वे केवल अपनी इच्छा के आधार पर धुंध
में संघर्ष कर रहे होते हैं और ठोकर खा
रहे होते हैं
और यह यात्रा बहुत कठिन होती है
और इससे बहुत अधिक हृदय विदारक पीड़ा होती
है।
इसलिए जब लोगों को यह एहसास होता है कि
परमेश्वर मानव भाग्य पर संप्रभु है तो
चतुर लोग परमेश्वर की संप्रभुता को जानना
और स्वीकार करना चुनते हैं और भाग्य के
खिलाफ संघर्ष जारी रखने और अपने तरीके से
अपने तथाक कथित जीवन लक्ष्यों का पीछा
करने के बजाय अपने स्वयं के हाथों से एक
अच्छा जीवन बनाने की कोशिश करने के
दर्दनाक दिनों को अलविदा कहते हैं।
जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के बिना होता है।
जब वह उसे नहीं देख सकता है। जब वह वास्तव
में और स्पष्टता से परमेश्वर की संप्रभुता
को नहीं जान पाता है।
तो उसका हर दिन निरर्थक बेकार और अवर्णनीय
रूप से पीड़ादायक होता है। इससे कोई फर्क
नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कहां है और
उसका क्या काम है। उनके जीने के साधन और
जिन लक्ष्यों का वे अनुसरण करते हैं। वे
उन्हें केवल अंतहीन दिल के दर्द और ऐसी
पीड़ा देते हैं जिससे उबरना इतना कठिन
होता है। वे पीछे अपने अतीत को मुड़कर
देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।
हो
सृष्टिक्ता की संप्रभुता को स्वी स्वीकार
करके
उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति
समर्पण करके
और एक सच्चा मानव जीवन हासिल करने का
अनुसरण करके ही कोई व्यक्ति धीरेधीरे
समस्त दिल के दर्द और पीड़ा से मुक्त हो
सकता है।
और धीरेधीरे मानव जीवन के सारे खालीपन से
खुद को छुटकारा दिला सकता है।
